यह तो चीन ही जाने कि वह किस आधार पर इस आतंकी सरगना पर पाबंदी लगाने में तकनीकी बाधा उत्पन्न कर रहा था, लेकिन उसकी अड़ंगेबाजी भारतीय हितों के खिलाफ थी। शायद पाकिस्तान का अंध समर्थन करने की जिद में वह इसकी भी अनदेखी कर रहा था कि उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि दागदार हो रही। आखिरकार वह भारत के साथ ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि देशों के कूटनीतिक दबाव में झुका, लेकिन इसका अंदेशा अभी भी बना हुआ है कि वह पाकिस्तान की भारत विरोधी हरकतों की अनदेखी कर आगे भी उसका बचाव करेगा।

मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदी लगने का अर्थ है उसकी आवाजाही पर रोक, संपत्तियों की जब्ती और उसके हथियार रखने पर प्रतिबंध। सुरक्षा परिषद के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कहा है कि उसने ये सारे कदम उठा लिए हैैं, लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कायदे से मसूद अजहर पर पाबंदी की मांग तभी मान ली जानी चाहिए थी जब 2009 में पहली बार इसकी मांग उठी थी, क्योंकि उसका संगठन प्रतिबंधित कर दिया गया था। मसूद अजहर को अपहृत भारतीय विमान के यात्रियों के बदले रिहा किया गया था।

संसद के साथ पठानकोट एयरबेस पर हमले में भी उसका हाथ रहा। पुलवामा का हमलावर भी जैश सदस्य था। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैैं कि इस हमलावर को पाकिस्तान से मदद मिली। मसूद अजहर भारत में आतंक फैलाने में इसीलिए समर्थ बना रहा, क्योंकि उसकी पीठ पर पाकिस्तानी सेना का हाथ था। पाकिस्तानी सेना कश्मीर में भारत के खिलाफ जो छद्म युद्ध छेड़े हुए है उसमें उसे जैश, लश्कर जैसे आतंकी संगठन उसका साथ देते हैैं। पाकिस्तानी सेना भारत से इसलिए खुन्नस खाती है, क्योंकि वह भारत के हाथों बार-बार पराजित हुई है। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की असली सत्ता उसके पास ही है। चूंकि पाकिस्तानी सेना भारत से बदला लेने की मानसिकता से ग्रस्त है इसलिए इसके आसार नहीं कि मसूद अजहर पर पाबंदी लग जाने के बाद कश्मीर में पाकिस्तानी पोषित आतंकियों की घुसपैठ में कमी आएगी। स्पष्ट है कि भारत को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि पाकिस्तान आसानी से सही रास्ते पर आ जाएगा।

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस उम्मीद में पाकिस्तान के प्रति दोस्ताना रवैया दिखाया था कि वह शांति की भाषा समझेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार तो इस हालत में ही नहीं कि वह अपनी सेना के दबाव से मुक्त हो सके। इस पर आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को सेना की कठपुतली माना जाता है। उड़ी हमले के बाद मोदी सरकार ने पहले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला लिया और फिर पुलवामा हमले के बाद एयर स्ट्राइक का। बालाकोट में भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक का पाकिस्तान पर गहरा असर हुआ है। वह अब तक सहमा हुआ है।

फिलहाल यह कहना कठिन है कि अब पाकिस्तान के प्रति भारत की रणनीति क्या होगी, लेकिन माना यही जा रहा है कि अगर मोदी सरकार फिर सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसके खिलाफ सख्ती बरतने की नीति पर चलते रहेंगे। यह आवश्यक भी है, क्योंकि पाकिस्तान को यह पता चलना ही चाहिए कि अब भारत उसकी आतंकी गतिविधियों को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं। भारत को पाकिस्तान के खिलाफ दबाव बनाने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय का साथ लेने के साथ ही चीन के रवैये को लेकर सतर्क भी रहना होगा। चूंकि बालाकोट हमले के बाद विश्व समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है इसलिए इसका लाभ उठाया जाना चाहिए।

इसमें दो राय नहीं कि मसूद अजहर पर पाबंदी लगना एक बड़ी सफलता है, लेकिन इसके बावजूद आवश्यक यह है कि भारत पाक की गतिविधियों से सतर्क रहे। उसे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के साथ अन्य आतंकी गुटों से भी सावधान रहना होगा। पहले श्रीलंका में भीषण आतंकी हमला और फिर इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन आइएस के सरगना का वीडियो सामने आना यही बताता है कि भारत को कहीं अधिक चौकन्ना रहना चाहिए।

भारत को आतंकी संगठनों से सतर्क रहने के साथ ही उनकी गतिविधियों के बारे में सटीक खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान की भी कोशिश करनी चाहिए और उनके धन स्नोतों पर लगाम लगाने की भी। हालांकि मसूद अजहर पर पाबंदी के बाद अमेरिका ने पाक को नए सिरे से चेताया है, लेकिन भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि वह आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई करने में माहिर है।

इस समय देश में चुनाव चल रहे हैं और तमाम अन्य मुद्दों के साथ यह बात भी चर्चा में है कि मोदी सरकार ने पाकिस्तान पर पहले सर्जिकल स्ट्राइक की और फिर एयर स्ट्राइक। भाजपा इन दोनों सैन्य अभियानों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है। इसी के साथ वह विपक्ष और खासकर कांग्रेस को इसके लिए कठघरे में खड़ा कर रही है कि उसने सत्ता में रहते समय आतंकवाद का डटकर मुकाबला नहीं किया। चुनाव प्रचार में भाजपा नेता मसूद अजहर पर पाबंदी का भी जिक्र कर रहे हैैं। इस आतंकी सरगना पर पाबंदी भारत की एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है। आम तौर पर इसका सभी ने स्वागत किया है, लेकिन कांग्रेस यह भी उल्लेख कर रही है कि एक समय भाजपा सरकार ने ही इस आतंकी सरगना को रिहा किया था।

कांग्रेस का यह भी दावा है कि उसके समय भी कम से कम छह सर्जिकल स्ट्राइक की गईं। कांग्रेस का यह दावा उसकी हताशा का ही परिचायक है। कांग्रेस एक ओर तो यह कह रही है कि सेना के पराक्रम का ढिंढोरा नहीं पीटा जाना चाहिए और दूसरी ओर वह छह सर्जिकल स्ट्राइक का दावा करके ठीक यही काम कर रही है। समझना कठिन है कि कांग्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी देश-दुनिया को क्यों नहीं दी? सवाल यह भी है कि इस समय छह सर्जिकल स्ट्राइक के दावे का क्या मतलब?

क्या कांग्रेस को यह पता नहीं कि जब कभी इस तरह की सैन्य कार्रवाई होती है तो जनता का मनोबल बढ़ता है? यह वही कांग्रेस है जिसका यह कहना रहा है कि सरकार को सेना की कार्रवाई का बखान नहीं करना चाहिए। कम से कम उसे तो यह पता होना चाहिए कि सेना सरकार की अनुमति से ही किसी अन्य देश में कोई कार्रवाई करती है और इस तरह की कार्रवाई का एक बड़ा मकसद शत्रु देश को सख्त संदेश देना होता है।