आशीष व्यास, भोपाल। देश के ‘हृदय-प्रदेश’की धड़कनों ने ‘मोदी-मैजिक’को मजबूत मान्यता देकर एक ऐसी मिसाल खड़ी कर दी है, जिसकी कल्पना मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य पर कभी भी नहीं की गई। या, यूं कहें कि देश का दिल भी मोदी के जादू पर बल्लियों उछल रहा है। मई की तेज तपन में भी प्रदेश के हर हिस्से में कमल खिलखिला रहा है। सत्ता का साथ पाकर सीट बढ़ने के कांग्रेसी पूर्वानुमान भी सिर औंधे किए बैठे हैं। 

जनता के दिए एकतरफा बहुमत से न केवल विपक्ष, बल्कि सत्ता पक्ष भी भौंचक है। राजनीतिक पूर्वानुमान और अटकलों के बीच भाजपा को जीतने की उम्मीद तो थी, लेकिन कांग्रेस को इस तरह नेस्तनाबूत करते हुए भगवा ध्वज फहराएगा, इसका अनुमान मध्य प्रदेश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों को भी संभवत: नहीं रहा होगा। जो कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया के भरोसे उत्तर प्रदेश में अपना विजय रथ निकालने चली थी, पार्टी का वो भरोसेमंद चेहरा अपने परंपरागत गढ़ गुना में ही चारों खाने चित हो गया। यहीं से राजनीतिक समझसमीकरणों का वह सिरा पकड़ा जा सकता है और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि मध्य प्रदेश किस हद तक मोदी पर न्यौछावर था। 

शुरुआती रुझान और परिणामों का विश्लेषण करने वाले छोटे- बड़े कांग्रेसी नेता भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि गुना और छिंदवाड़ा सीट पर पार्टी कभी संघर्ष करती हुई भी देखी जा सकती है! जब महाराजा के ही ये हाल है तो ग्वालियर-चंबल की दीगर सीटों पर कांग्रेस की ऐसी दुर्गति आश्चर्य का विषय नहीं होनी चाहिए। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की राजनीतिक यात्रा को सत्ता के साकेत में स्थापित करने में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का योगदान उल्लेखनीय माना जाता है, लेकिन पार्टी के पुनर्वास के लिए नर्मदा-यात्रा करते समय दिग्गी राजा को यह आभास भी नहीं होगा कि भविष्य में कमलनाथ उन्हें मजबूत सीट से मैदान में उतरने की चुनौती दे सकते हैं। एक ऐसी निर्णायक राजनीतिक लड़ाई का मोहरा बना सकते हैं, जहां विजय ही एकमात्र विकल्प होगा। 

मुखर दिग्विजय सिंह ने संयम और प्रबंधन के साथ मैदान संभाला, लेकिन हिंदुत्व का मुखर-प्रखर चेहरा बनीं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने उन्हें परास्त कर ही दिया। राजनीतिक प्रतीकों- परिभाषाओं में समझने का प्रयास करें तो जिस प्रज्ञा को भाजपा ने हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए अपना प्रतिनिधि बनाया, उसने संघर्ष को सिद्ध कर 100 प्रतिशत सफलता अर्जित कर ली। प्रज्ञा ने वोटों का ऐसा ‘पारदर्शी-प्रबंधन’किया कि राजा को प्रजा के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा! मध्य क्षेत्र के इस शीर्ष पार्टी-पोस्टर चेहरे का ही जब यह हाल है, स्वाभाविक रूप से माना जा सकता है कि इलाके के शेष सिपाहियों की कमर तो टूटनी ही थी।

विंध्य क्षेत्र में विधानसभा चुनावों की तरह ही भाजपा के पक्ष में वोट गए। बहुजन समाज पार्टी का जनाधार लगातार घटा और ये वोट भाजपा के खाते में जुड़ते-बढ़ते चले गए। परिणाम यह रहा कि भाजपा ने सभी सीटों पर ना केवल लंबी छलांग लगाई, बल्कि तुलनात्मक रूप से खुद को एक मजबूत स्थिति में खड़ा कर लिया।