2019 लोकसभा चुनाव को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की 

2019 के आम चुनाव में, सत्तारूढ़ दल भाजपा ने भोपाल लोकसभा क्षेत्र से प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी की घोषणा करके भारत को स्तब्ध कर दिया. प्रज्ञा ठाकुर, जिन्हे साध्वी प्रज्ञा नाम से भी जाना जाता है, मालेगांव मस्जिद बम विस्फोट मामले में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत एक आरोपी हैं और जमानत पर बाहर हैं.

एक निजी समाचार चैनल को दिए साक्षाकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रज्ञा की उम्मीदवारी का बचाव किया और कहा कि हिन्दू “वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखने वाली 5,000 पुरानी संस्कृति है. इसे कुछ लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते हिन्दू आतंकवाद के रूप में ब्रांडेड किया गया था.”

यूपीए शासन के दौरान, कांग्रेस के नेता सुशील कुमार शिंदे और पी. चिदंबरम ने हिंदुओं के तेजी से बढ़ती कट्टरता के खिलाफ चेतावनी देने के लिए ‘हिंदू आतंक’ या ‘भगवा आंतक’ शब्द का इस्तेमाल किया था.

हालांकि नरेंद्र मोदी का यह दावा कि हिन्दू कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकता, बिलकुल बेबुनियाद है. इतिहास में हिन्दुओ के हिंसक होने के कई उदाहरण मिलते हैं. यह किसी भी धर्म को मानने वालों के लिए सच है. हर धर्म के लोगों ने अतीत में कई ऐसे कारनामे किए हैं, जिन्हें संबंधित धर्म के लोग याद नहीं करना चाहते.

प्राय: अज्ञानता और उससे भी ज्यादा राजनीतिक मकसद से आतंकवाद को मुसलमान जैसी दिखने वाली छवि में सामान्यीकृत किया जाता है. जबकि आतंकवाद को परिभाषित करने वाले हमारे चयनात्मक दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक आतंकवाद की परिभाषा है, ‘राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नागरिकों के खिलाफ हिंसा और भयादोहन का इस्तेमाल करना.’ जबकि कैंब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक आतंकवादी वो है जो ‘राजनीतिक मकसद से हिंसा करता है या हिंसा की चेतावनी देता है.’

इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत का पहला आतंकवादी मनु था, जिसने समाज और सत्ता पर एक वर्ग का वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से मनुस्मृति की रचना की थी. यह अकारण नहीं है कि बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था और उनके इस कार्य में सवर्ण बुद्धिजीवी भी शामिल हुए थे. मनुस्मृति के जरिए न सिर्फ ब्राहम्णों का एकाधिकार स्थापित किया गया, बल्कि शूद्रों को अनगिनत यातनाओं का शिकार बनाया. इस ग्रंथ के जरिए भारत में वर्ण व्यवस्था की स्थापना की गई.

मनुस्मृति के अनुसार यदि कोई शूद्र (निम्न जाति) वेद सीखने की हिम्मत करता है, तो उसके कानों को पिघला हुआ सीसा और लाख से भर देना चाहिए. मनुस्मृति के विधान के कारण शूद्र शिक्षा और सम्पति रखने से वंचित हुए तथा निचले पायदान पर ढकेल दिए गए. बाबा साहब की लिखी किताब शुद्रो की खोज में इसका वर्णन मिलता है.

बाबा साहेब मनुस्मृति के हवाले से (सरकार द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब लेखन और भाषण, खंड 17 पेज 50 ) लिखते हैं- एक ब्राह्मण को बिना किसी सोच विचार के शूद्रों की संपत्ति ले लेनी चाहिए क्योंकि वह उसकी है ही नहीं, सारी संपत्ति उसके मालिक की है. (मनुस्मृति, अध्याय-8, श्लोक -417). मनुस्मृति में आगे लिखा है- शूद्रों को संपत्ति का संचय नहीं करना चाहिए क्योंकि शूद्रों के पास संपत्ति देखने से ब्राह्मणों को कष्ट होता है.(मनुस्मृति, अध्याय-10, श्लोक 129).

पेशवा शासकों को उनके हिंदू रूढ़िवादी शासन और शूद्रों के दमन के लिए कुख्यात माना जाता था. पेशवा ने अछूत जाति के लोगों को अपने थूक को इकट्ठा करने के लिए गले में मटका और अपने पैरों के निशान मिटाने के लिए अपनी पीठ के पीछे झाड़ू बांधने के लिए मजबूर किया. शूद्रों का दमन खोत प्रथा के द्वारा किया जाता, जिसके बारे में महात्मा जयोतिबा फुले ने अपनी किताब गुलामगीरी में लिखा है. मानसिक वह शारीरिक यातना आतंक का पर्याय है. इसमें कोई खेत मजदूर लगभग गुलाम की स्थिति में खेत के मालिक से बंधा होता है. बाबा साहेब आंबेडकर ने इसके खिलाफ बहुत बड़ा आंदोलन चलाया था और एक विधेयक भी पेश किया था (बाबा साहेब आंबेडकर लेखन और भाषण, खंड 2, पेज 96 और 101). राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ के समर्थक भारतीय सविंधान को हटा कर मनुस्मृति पुनः स्थापित करना चाहते है.